Sunday, July 29, 2007

फिर भी दिल है हिंदुस्तानी

बहुत समय के पश्चात भार्तिये क्रिकेट टीम ने हमारे देश के बहार कुछ अच प्रदर्शन किया है । इसी विषय में कल हमारी क्रिकेट तें ने पत्रकारो कि एक सभा बुलाई थी .... जिसे अन्ग्रेसी बाशा में प्रेस कोन्फेरेंस कहते हैं । इस सभा में भारिये एवं हमारे ऊपर पूर्व राज करने वाले देश इंग्लैंड के पत्रकार आये थे । इस अवसर पर हमारे सलामी बल्लेबाज़ वे हिंदी कोस्मभोदिथ लक्ष्मण ने इन पत्रकारो को स्म्भोदिथ किया ।

वे हिंदी में पत्रक्रो को सम्भोदिथ कर रहे थे । इस पर कई विदेशी पत्रकार उनकी इस बाशा के प्रयोग से कुश नही हुए और इससे पहले की वे अपना उत्तर समाप्त करे वे उनकी मेज़ से अपने यन्त्र उठा कर चलते बने ।
मैंने सोचा ऐसा क्यों हुआ । क्या यह इसलिये हुआ कि एक भार्तिये ने अपनी मत्रबषा का प्रयोग किया । तो फिर जब यह फिरंगी आकर अपनी भाषा हमारे ऊपर थोपते हैं तो हम उनकी वाह वाह करते हैं । हममे बचपन से सिखाया जता है अतिथि देवोभावा ..... जिसके मतलब है कि एक अतिथि भगवन समान होता है । परुन्तु इसका अर्थ यह तो नही कि हम चुप बिठेंगे जब कोई हमारी मातृभाषा कि इस प्रकार से बेअज़ात्ती करेगा । हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है ..... जिसमें जिस प्रकार बोलते हैं उससी प्रकार लिखते हैं । यह एक भार्तिये होने कि पहचान है और मुझे इस बात पर गर्व है कि हमारी भाषा विश्व कि सबसे पुराणी भाषाओं में से एक है । आप लोगो ने कभी किसी रूसी या फ़्रांस के नाग्रिग को अंग्रेजी में वार्तालाप करते हुए सुना है ........ नही । वे उसी प्रकार अपनी मातृभाषा में वार्तालाप करते हैं जिस प्रकार अम्रेकन या अँगरेज़ अंग्रेजी में बात करते हैं । तो फिर हममे किस बात से शर्म है । हम उन लोगो से ज़्यादा आमिर हैं अब । हमारी फोजें उनसे ज़्यादा शक्तिमान हैं । हमारें इंजीनियर , वैज्ञानिक , डाक्टर उन सब देशो से उच् स्तर के हैं । हम किसी प्रकार से उनसे पीछे नही । तो फिर हम उन गोरी चमडी के गुमान को क्यों बढ़ाते हैं । हम लोग क्यों उनके जैसा बन्न्ना चाहते हैं ?

मैं एक भातिये हु । हिंदी मेरी राष्ट्रभाषा है । जन गन मन मेरा राष्ट्रीय गीत है । शेर मेरा राष्ट्रिये पशु है । मेरा देश विश्व का सात्व सबसे बड़ा देश है । मेरे देश ने आजतक किसी और देश पे आक्रमंद नही किया । मैं उस देश का वासी हु जहाँ सबसे पहले मानव ने सभ्यता का मतलब सीखा था । जहाँ पर बुध और नानक ने शांति का पाठ पढाया था । जहाँ रिग वेध के रुप में सबसे पहला ग्रंथ लिखा गया था । जहाँ सों करोड लोग जो कि एक दुसरे से ब्भिं भीं प्रकार से अलग है सुख एवं सम्रिधि से रहते है । मुझे इन बातों का गर्व है और हिंदी मेरी मातृभाषा है जिसका मुझे गुमान है ।

जय हिंद
Post a Comment